वेस्ट डीकंपोजर और भारतीय कृषि परम्परा

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अभी अभी वर्तमान भारत सरकार द्वारा राष्ट्र -हित की अनेक परिकल्पनाओं और लिए गए संकल्पों में जैविक खेती को प्रमुखता प्रदान की गयी है |

इसके लिए सरकार का कृषि मंत्रालय व्यापक अनुसन्धान ,छोटे बड़े सेमिनार का आयोजन राज्य सरकारों के सहयोग से पंचायत तक प्रचार प्रसार तथा प्रयोग का कार्यक्रम आयोजित भी कर रहा है |यह मुहीम उस कृषि प्रधान भारत की एक खोज  की भी है जो आजादी के बाद  हरित क्रांति के नाम पर किसानों को रासायनिक उर्वरक , तथा कीटनाशक दवाईयां को झोंक कर अन्य कारणों से  अन्न के मामले में परावलंबित देश को अधिक उपज का क्षणिक प्रलोभन देकर   सदा उर्वरा धरती को बाँझ बना रही है |किसान किसी श्रेणी में ही नहीं रहा | यह सिलसिला जारी है |

भारत की उन्नति कृषि की वास्तविक उन्नति के बिना संभव ही नहीं है क्योंकि लाख पलायन के बाद भी भारत का असली पता गाँव ही है और वृत्ति पेशा नहीं खेती ही है |अतीत का भारत उन्नत जैविक खेती पर ही आधारित था | यह अतीत बहुत पुराना नहीं है | पचास साठ वर्ष पहले तक खेती में रासायनिक निर्भरता नहीं थी |पशु धन तथा जन धन योजना नहीं दोनों का समन्वय इतना एकमेक था जिस कारण खेती में जैविक समायोजन सहज रूप से स्वतः हो जाता था और किसान सुखी थे | दुनिया किसानो की  ही रही है | आज का वैश्विक गाँव  कोई नयी  परिकल्पना नहीं है इसके बिना दुनिया की भी कोई पहचान नहीं बनती है |

जैविक खेती को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अधीन कृषि केंद्र गाजियावाद के वैज्ञानिक डॉक्टर कृष्णा चंद्रा द्वारा आविष्कृत वेस्ट डी कंपोजर एक सफल और जैविक खेती का शून्य बजट से उत्तम खेती करने का विकल्प है |उनके अनुसार गाय के गोबर से तीन वैक्टीरिया को मिलाकर उसका एक पाउडर तैयार किया गया है जो धरती की उर्वरा शक्ति को कुछ ही दिनों में वर्मियुक्त बनाकर बढ़ा देता है |दूसरा ,फसल को पौष्टिक तत्व प्रदान कर उसका समुचित विकास और उसके फल फूल की श्रीवृद्धि, प्रयोग के कुछ ही समय के बाद दिखने लगता है |तीसरे ,फसल और उसके आस पास के पर्यावरण को कीट तथा प्रदुषण मुक्त कर देता है |वैज्ञानिक का दावा है कि बंजर, पथरीली,आर्सेनिक धरती पर भी इसके प्रयोग से मनचाही फसल ली जा सकती है |लगातार वेस्ट डी कंपोजर के प्रयोग से एक वर्ष के अंदर कठोर से कठोर भूमि भी भुरभुरी हो कर स्वस्थ  हो जाती है |दावा यहाँ तक है कि विविध मौसम और प्राकृतिक अनुकूलता में कोई भी उत्पाद तैयार किया जा सकता है |(स्रोत -यू ट्यूब पर डॉक्टर कृष्णा चंद्रा का कार्यक्रम ) जहाँ तक वेस्ट डी कंपोजर के निर्माण का प्रश्न है , वह अत्यंत सरल और सहज रूप से प्राप्त संसाधनों से ही निर्मित होता है |सर्वप्रथम इसका घोल तैयार किया जाता है  | वेस्ट डी कंपोजर की एक  बोतल की कीमत मात्र 20/ रूपये है | यह बाज़ार में उपलब्ध भी नहीं है| भारत सरकार के विविध कृषि केन्द्रों में इसे  उपलब्ध कराया गया है |

ऐसे वेब साईट पर जाकर कोई भी अपने निकटतम केन्द्रों से प्राप्त कर सकता है |अथवा आस पास का कोई किसान यदि इसका प्रयोग कर रहा है तो उससे इसका 1लीटर घोल लेकर प्लास्टिक का एक ड्रम जिसमें 200 लीटर पानी की जगह हो उसमे दो किलो गुड डालकर एक लीटर वेस्ट डी कंपोजर का घोल मिलाकर किसी लकड़ी के डंडे से एक सप्ताह तक हिलाते रहे |एक सप्ताह में यह घोल तैयार हो जाता है जो अनवरत जीवन भर इसी घोल से एक लीटर निकालकर बार बार तैयार किया जा सकता है |यही घोल मदर कल्चर के रूप में पुष्टिकर (Nutrient) तथा कीटनाशक के रूप में विविध अवयवों के मिलाने पर तैयार होता है |

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